Hnews · हिंदी समाचार8 सितम्बर 2026
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राजनीति

महिला आरक्षण पर फिर तेज हुई चर्चा, ओम बिरला बोले — नई पीढ़ी की महिला नेतृत्व के लिए खुलेगा रास्ता

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को ऐतिहासिक जरूरत बताया। राष्ट्रीय महिला आयोग की कार्यशाला में उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में महिला नेतृत्व की नई पीढ़ी सामने आएगी।

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विधायी सदन का सभागार

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने महिला आरक्षण को लेकर चर्चा फिर तेज कर दी है। राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की ‘जेंडर-रिस्पॉन्सिव गवर्नेंस’ विषय पर आयोजित कार्यशाला के उद्घाटन के दौरान उन्होंने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को ऐतिहासिक जरूरत बताया।

बिरला ने क्या कहा

लोकसभा अध्यक्ष के अनुसार यह आरक्षण महिलाओं के लिए राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक क्षेत्रों में नई जगह खोलेगा। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में महिला नेतृत्व की एक नई पीढ़ी सामने आएगी।

उनके संबोधन का जोर एक अहम बदलाव पर था — प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से आगे बढ़कर नीति निर्माण में वास्तविक भागीदारी। उनका तर्क था कि महिला विधायकों और सांसदों को ऐसे कानून बनाने में भूमिका निभानी चाहिए जो जमीनी हकीकत को दर्शाते हों।

कानून की स्थिति क्या है

महिला आरक्षण से जुड़ा विधेयक 2023 में संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुका है। इससे पहले इस विषय पर लंबा संसदीय इतिहास रहा है — 2008 में पेश किया गया संविधान संशोधन विधेयक 2014 में निष्प्रभावी हो गया था, और बाद में इसे फिर आगे बढ़ाया गया।

हालांकि कानून पारित होने के बावजूद इसका क्रियान्वयन अभी बाकी है। व्यवस्था के अनुसार आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जुड़ी है। यही वह बिंदु है जिस पर सबसे ज्यादा राजनीतिक बहस होती रही है।

बहस के दो पक्ष

समर्थन में तर्क यह है कि पंचायत स्तर पर आरक्षण के बाद महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, और विधानसभा तथा संसद स्तर पर भी यही असर देखने को मिल सकता है।

दूसरी ओर, कई दलों की मांग रही है कि आरक्षण के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग प्रावधान होना चाहिए। एक अन्य सवाल क्रियान्वयन की समयसीमा को लेकर है — विपक्ष का कहना रहा है कि जनगणना और परिसीमन से जोड़ने के कारण लागू होने में लंबा समय लग सकता है।

संख्या क्या कहती है

भारत की संसद और अधिकांश विधानसभाओं में महिला सदस्यों का अनुपात लंबे समय से कम रहा है। स्थानीय निकायों में स्थिति भिन्न है, जहां आरक्षण पहले से लागू है और महिलाओं की भागीदारी काफी अधिक दर्ज की जाती है। यही तुलना आरक्षण समर्थकों का मुख्य आधार रही है।

आगे क्या

लोकसभा अध्यक्ष का यह बयान ऐसे समय आया है जब सरकार की ओर से इस विषय पर नए सिरे से पहल की चर्चा है। असली परीक्षा क्रियान्वयन की समयसीमा तय होने पर होगी। जब तक जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होती, तब तक यह बहस बयानों के स्तर पर ही चलती रहेगी।

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