Hnews · हिंदी समाचार8 सितम्बर 2026
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राजनीति

‘नाराज फूफा’ पर सियासी घमासान: मोदी के तंज पर कांग्रेस का पलटवार, खरगे बोले — हर साल नया विशेषण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘नाराज फूफा’ वाले तंज पर कांग्रेस ने पलटवार किया है। मल्लिकार्जुन खरगे का कहना है कि विपक्ष को हर साल एक नया विशेषण देना सरकार की नाकामियां छिपाने का तरीका है।

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आमने-सामने रखे दो मंच — राजनीतिक बयानबाजी का प्रतीक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘नाराज फूफा’ वाले तंज को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस ने इसे सरकार की नाकामियों से ध्यान हटाने की कोशिश बताया है, जबकि प्रधानमंत्री ने अलग-अलग मंचों से इस मुहावरे को दोहराया है।

कहां से शुरू हुई बात

प्रधानमंत्री ने यह शब्द श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) के शताब्दी समारोह में इस्तेमाल किया था। उनका इशारा उन लोगों की ओर था जो हर बड़ी पहल में कोई न कोई कमी निकालते हैं। इसी भाषण में उन्होंने कॉलेज के पूर्व छात्रों के लिए ‘OG’ जैसे शब्द भी इस्तेमाल किए, यानी संबोधन में युवा पीढ़ी की भाषा शामिल की गई थी।

बाद में वडोदरा में फ्रेट कॉरिडोर से जुड़े कार्यक्रम में भी प्रधानमंत्री ने यही मुहावरा दोहराया और कांग्रेस के कार्यकाल पर निशाना साधते हुए शौचालय निर्माण के आंकड़ों का जिक्र किया।

कांग्रेस का जवाब

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पलटवार करते हुए कहा कि विपक्ष को हर साल एक नया विशेषण देना प्रधानमंत्री की कार्यशैली का हिस्सा है, जिसका मकसद अपनी नाकामियां छिपाना और लोकतंत्र में उठने वाले सवालों को दबाना है।

कांग्रेस नेताओं ने इस सिलसिले में पहले इस्तेमाल हुए कुछ शब्दों की सूची भी गिनाई — ‘अर्बन नक्सल’, ‘खान मार्केट गैंग’, ‘आंदोलनजीवी’ जैसे संबोधन इसी कड़ी में गिनाए गए। पार्टी का तर्क है कि यह बहस को मुद्दों से हटाकर व्यक्तियों पर ले जाने की रणनीति है।

क्यों महत्वपूर्ण है

भारतीय राजनीति में शब्दों के जरिए विपक्ष को परिभाषित करने की परंपरा नई नहीं है। ऐसे मुहावरे अक्सर लंबे भाषणों से ज्यादा तेजी से फैलते हैं, क्योंकि वे याद रखने में आसान होते हैं और सोशल मीडिया पर तुरंत प्रसारित हो जाते हैं।

इस बहस का दूसरा पहलू यह है कि जवाब देने वाला पक्ष भी उसी शब्द को दोहराता है, जिससे वह और प्रचलित हो जाता है। यही कारण है कि ऐसे तंज राजनीतिक संवाद में लंबे समय तक बने रहते हैं।

असली मुद्दा कहां है

शब्दों की इस लड़ाई के बीच जिन नीतिगत विषयों पर बहस चल रही थी — बुनियादी ढांचे का विस्तार, ग्रामीण स्वच्छता के आंकड़े और सरकारी योजनाओं का असर — वे पीछे छूट जाते हैं। दोनों पक्षों के दावों की जांच आंकड़ों के आधार पर ही संभव है, न कि विशेषणों के आधार पर।

आगे क्या

आने वाले महीनों में कई राज्यों में उपचुनाव और 2027 की तैयारियां शुरू होंगी। ऐसे में यह देखना होगा कि यह मुहावरा चुनावी भाषणों का स्थायी हिस्सा बनता है या कुछ हफ्तों में पीछे छूट जाता है। फिलहाल दोनों पक्षों की ओर से बयानबाजी जारी है।

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