हर साल 8 सितंबर को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस इस बार खास है — यह इस वैश्विक आयोजन की 60वीं वर्षगांठ है। इस वर्ष की वैश्विक थीम है ‘Literacy for people, the planet and prosperity’ यानी ‘लोगों, ग्रह और समृद्धि के लिए साक्षरता’।
इस साल की थीम का अर्थ
यह थीम साक्षरता को केवल पढ़ने-लिखने की क्षमता से आगे देखती है। इसका जोर इस बात पर है कि साक्षरता अवसर बढ़ाने, समावेश सुनिश्चित करने, टिकाऊ विकास और आजीविका सुधारने में क्या भूमिका निभा सकती है।
यूनेस्को इस वर्ष का वैश्विक समारोह 8-9 सितंबर को मेक्सिको सरकार के साथ मेक्सिको में आयोजित कर रहा है।
भारत की साक्षरता दर कहां पहुंची
भारत की साक्षरता दर में लगातार सुधार दर्ज हुआ है। 2011 की जनगणना में यह 74 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में बढ़कर लगभग 80.9 प्रतिशत तक पहुंच गई।
लंबी अवधि की तस्वीर और भी उल्लेखनीय है — 1951 में देश की साक्षरता दर करीब 18 प्रतिशत थी, जो अब 80 प्रतिशत से ऊपर है। यह सात दशकों में हुआ बड़ा बदलाव है।
पूर्ण साक्षर घोषित राज्य
ULLAS कार्यक्रम के तहत कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को पूर्ण साक्षर घोषित किया जा चुका है। जुलाई 2026 तक मिजोरम, गोवा, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम इस सूची में शामिल थे। 2026 में उत्तराखंड छठा पूर्ण साक्षर राज्य बना।
चुनौती अब कहां है
आंकड़ों में प्रगति के बावजूद तीन बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
पहली — साक्षरता की परिभाषा: पारंपरिक रूप से साक्षरता का अर्थ नाम लिख सकने और साधारण वाक्य पढ़ सकने से रहा है। लेकिन आज के दौर में इतना पर्याप्त नहीं है। बैंक का फॉर्म भरना, दवा का पर्चा पढ़ना, या मोबाइल पर सरकारी सेवा का इस्तेमाल करना — इनके लिए इससे कहीं ऊंचे स्तर की समझ चाहिए।
दूसरी — क्षेत्रीय और लैंगिक असमानता: राष्ट्रीय औसत के भीतर राज्यों के बीच बड़ा अंतर है। महिला और पुरुष साक्षरता के बीच का फासला भी कई क्षेत्रों में बना हुआ है।
तीसरी — डिजिटल साक्षरता: जब अधिकांश सरकारी सेवाएं और भुगतान ऑनलाइन हो रहे हैं, तो सिर्फ अक्षर ज्ञान वाले व्यक्ति के लिए भी बाधाएं बनी रहती हैं।
‘पहुंच से अवसर की ओर’
यही वह बदलाव है जिसकी चर्चा अब हो रही है। जब साक्षरता दर 80 प्रतिशत पार कर जाती है, तो प्राथमिकता स्कूल तक पहुंचाने से हटकर यह हो जाती है कि पढ़ाई की गुणवत्ता कैसी है और उससे अवसर कितने बनते हैं।
दूसरे शब्दों में, अब सवाल यह नहीं कि कितने लोग पढ़ सकते हैं, बल्कि यह कि पढ़ पाने से उनके जीवन में क्या बदला।
आगे क्या
आने वाले वर्षों में देखने लायक होगा कि शेष राज्य पूर्ण साक्षरता की श्रेणी में कब पहुंचते हैं, और क्या साक्षरता की माप में कार्यात्मक तथा डिजिटल कौशल को शामिल किया जाता है। यही अगला वास्तविक पड़ाव है।