कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नई चिंता खड़ी कर दी है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड करीब 97 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड लगभग 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा।
कीमत क्यों बढ़ी
तेजी की मुख्य वजह आपूर्ति में बाधा की आशंका है। अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिन का अस्थायी संघर्षविराम बिना किसी ठोस कूटनीतिक नतीजे के समाप्त हो गया, जिसके बाद ऊर्जा आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहने की चिंता फिर गहरा गई।
तेल बाजार में कीमतें अक्सर वास्तविक कमी से पहले ही आशंका पर प्रतिक्रिया देती हैं। यानी आपूर्ति रुकी नहीं है, लेकिन रुकने का जोखिम बढ़ते ही कीमत ऊपर चली जाती है।
भारत पर सीधा असर
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है। अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा हम आयात से पूरा करते हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमत में हर बढ़ोतरी का असर सीधे तीन जगह दिखता है:
आयात बिल: महंगा तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर चाहिए, जिससे व्यापार घाटा बढ़ता है।
महंगाई: ईंधन की लागत परिवहन के जरिए लगभग हर वस्तु की कीमत में शामिल हो जाती है। सब्जी से लेकर निर्माण सामग्री तक, ढुलाई महंगी होते ही दाम बढ़ते हैं।
कंपनियों की लागत: पेंट, प्लास्टिक, रसायन, टायर और विमानन जैसे क्षेत्रों में कच्चा तेल सीधे कच्चे माल या ईंधन का हिस्सा है। इनकी लागत बढ़ने से मुनाफे पर दबाव आता है।
रुपये की स्थिति
राहत की बात यह रही कि इस दौरान रुपया अपेक्षाकृत स्थिर रहा। डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 94.40 के आसपास कारोबार करता दिखा और उसमें बड़ी गिरावट दर्ज नहीं हुई। स्थिर रुपया आयात की लागत को कुछ हद तक संभाल लेता है, क्योंकि तेल का भुगतान डॉलर में होता है।
हालांकि अगर कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो आयात बिल बढ़ने से रुपये पर दबाव आना स्वाभाविक है।
आम आदमी की जेब पर क्या असर
तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत का असर पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम तक पहुंचने में समय लगता है, क्योंकि बीच में कर और तेल कंपनियों का मार्जिन होता है। लेकिन अगर कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो दबाव अंततः खुदरा दाम या सरकारी राजस्व — किसी न किसी पर पड़ता ही है।
घरेलू बजट के लिहाज से सबसे पहले असर ढुलाई पर आधारित वस्तुओं में दिखता है। इसके बाद खाद्य महंगाई और फिर सामान्य महंगाई दर पर प्रभाव पड़ता है, जिसका सीधा संबंध ब्याज दरों से है।
आगे क्या देखें
अगले कुछ हफ्तों में तीन चीजें अहम रहेंगी — पश्चिम एशिया की स्थिति में कोई कूटनीतिक प्रगति, ओपेक प्लस देशों का उत्पादन को लेकर रुख, और रुपये की चाल। अगर तेल 100 डॉलर के ऊपर टिकता है तो महंगाई के आंकड़ों पर इसका असर आने वाले महीनों में दिखने लगेगा।

