देश के सबसे उच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और प्रयागराज विकास प्राधिकरण को कड़ी फटकार लगाई है। कारण? बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया के नागरिकों के घरों को ध्वस्त करना।
न्यायालय ने प्रशासन के इस कृत्य को ‘अमानवीय और अवैध’ करार देते हुए कहा कि भारत में कानून का शासन है, और कोई भी सरकार मनमाने तरीके से नागरिकों के अधिकारों का हनन नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख – ‘आवासीय ढांचों को ऐसे नहीं तोड़ा जा सकता’
मंगलवार को सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नागरिकों के घरों को इस प्रकार अवैध रूप से गिराना न्यायिक प्रणाली और संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
“इस तरह की तोड़फोड़ से न्याय की आत्मा आहत होती है। हर नागरिक को रहने का अधिकार है और किसी भी सरकारी एजेंसी को उसे बेघर करने का हक नहीं है।”
प्रभावित नागरिकों को मिलेगा मुआवजा – सुप्रीम कोर्ट का आदेश
कोर्ट ने पीड़ितों को राहत देते हुए आदेश दिया कि प्रयागराज में जिन घरों को ध्वस्त किया गया, उनके मालिकों को सरकार छह हफ्तों के भीतर ₹10 लाख प्रति परिवार मुआवजा दे।
यह फैसला न केवल प्रभावित परिवारों के लिए एक बड़ी राहत है, बल्कि सरकारी एजेंसियों के लिए भी एक चेतावनी है कि वे कानून से ऊपर नहीं हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार पर पहले भी उठे हैं सवाल
यह पहली बार नहीं है जब यूपी सरकार की इस प्रकार की कार्रवाई पर सवाल उठे हैं। सुप्रीम कोर्ट पहले भी राज्य सरकार के इस रवैये को ‘गलत संदेश’ करार दे चुका है।
24 मार्च को हुई पिछली सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस तोड़फोड़ को ‘सरकार की मनमानी’ करार दिया था और कहा था कि इस तरह का कृत्य कानून के शासन को कमजोर करता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क – ‘सरकार ने गलती से गिराए घर’
इस मामले में वकील जुल्फिकार हैदर और प्रोफेसर अली अहमद सहित कई अन्य पीड़ितों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि:
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उन्हें 6 मार्च 2021 को एक नोटिस जारी किया गया था।
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यह नोटिस प्रयागराज के लूकरगंज इलाके के नजूल प्लॉट नंबर 19 से संबंधित था।
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प्रशासन ने बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए घरों को तोड़ दिया।
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सरकार ने यह मान लिया कि यह जमीन अतीक अहमद की थी, जबकि यह सामान्य नागरिकों के स्वामित्व में थी।
राज्य सरकार का पक्ष – ‘अतिक्रमण हटाने के लिए कार्रवाई की गई’
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए महाधिवक्ता आर वेंकटरमणि ने अदालत में अपना बचाव किया।
उन्होंने कहा:
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प्रयागराज में अवैध अतिक्रमण की समस्या बढ़ रही है।
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राज्य सरकार के लिए इन अनधिकृत कब्जों को हटाना जरूरी था।
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प्रशासन ने उचित नोटिस जारी किए थे, लेकिन अब आगे और सतर्कता बरती जाएगी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुआ और सरकार को कड़ी फटकार लगाई।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश – कानून का पालन करें, नहीं तो होगी सख्त कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट कर दिया कि सरकारी एजेंसियां कानून से ऊपर नहीं हैं। किसी भी प्रशासन को
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नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
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बिना उचित नोटिस और सुनवाई के तोड़फोड़ नहीं कर सकते।
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कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
इस फैसले के क्या मायने हैं?
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प्रभावित परिवारों के लिए राहत: अब उन्हें ₹10 लाख का मुआवजा मिलेगा, जिससे वे दोबारा बस सकेंगे।
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सरकारी मनमानी पर लगाम: यह फैसला अन्य राज्यों के लिए भी एक चेतावनी है कि वे कानून के तहत ही कार्रवाई करें।
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नागरिक अधिकारों की सुरक्षा: यह फैसला यह भी दिखाता है कि न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए तत्पर है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत में कानून के शासन को मजबूत करता है। यह नागरिकों के अधिकारों को प्राथमिकता देने की एक बड़ी मिसाल है।
भविष्य में अगर कोई भी सरकार इस तरह से मनमानी करती है, तो न्यायपालिका सख्त कदम उठाएगी।