Thursday, April 3, 2025
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दिल्ली भगदड़: ‘अफरा-तफरी में लोहे की छड़ मेरी बेटी के सिर के आर-पार हो गई’

महा कुंभ की आस्था बनी मातम का सबब

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 13-14 पर हुई भगदड़ में कई निर्दोष जिंदगियाँ खत्म हो गईं। हजारों श्रद्धालु महा कुंभ जाने के लिए उमड़े थे, लेकिन अव्यवस्थित भीड़ प्रबंधन ने इस यात्रा को त्रासदी में बदल दिया। कई मासूम बच्चे भी इस दर्दनाक हादसे की भेंट चढ़ गए। पीड़ित परिवारों में गुस्सा और शोक का माहौल है।

आस्था की सीढ़ियाँ बनी मौत का कारण

शनिवार रात, हजारों श्रद्धालु ट्रेन पकड़ने के लिए 42 सीढ़ियों पर चढ़ रहे थे। लेकिन कुछ ही मिनटों में सबकुछ बदल गया। असंतुलित भीड़ एक-दूसरे पर गिरने लगी, लोगों के पैरों तले इंसान कुचले जाने लगे। जीवन की तलाश में आए श्रद्धालु, मौत की आगोश में समा गए।

‘मेरी बेटी मेरी बाहों में दम तोड़ गई’

सागरपुर निवासी ओपिल सिंह, जिन्होंने अपनी सात वर्षीय बेटी रिया को इस भगदड़ में खो दिया, ने रुंधे गले से बताया—
“मैं अपनी बेटी के साथ प्लेटफार्म पर था, जबकि मेरी पत्नी और दूसरा बच्चा सीढ़ियों पर आगे निकल चुके थे। अचानक भीड़ में हलचल बढ़ गई। लोग हमारे ऊपर गिरने लगे। इसी दौरान लोहे की एक छड़ मेरी बेटी के सिर के आर-पार हो गई।”

उन्होंने बेटी को गोद में उठाया और एक ऑटो रिक्शा से अस्पताल दौड़े, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए सिंह बोले, “कोई मुआवजा मेरी बेटी को वापस नहीं ला सकता।”

‘मौत का जाल—उतरते-चढ़ते लोगों के बीच फँसी भीड़’

पीड़ितों के परिजनों ने अव्यवस्थित भीड़ नियंत्रण को इस त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार ठहराया। संजय, जिन्होंने अपनी बहन पिंकी देवी को खो दिया, ने बताया—
“हम 12 लोग थे। रात 8 बजे प्लेटफार्म पर पहुँचे थे। जैसे ही हम सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे, भगदड़ मच गई। चारों तरफ लोग चिल्ला रहे थे। मेरी 11 साल की बेटी को भीड़ ने रौंद डाला। किसी तरह मैंने उसे खींचकर बाहर निकाला, लेकिन उसके कपड़े फटे हुए थे।”

‘मेरी बेटी अगले महीने 12 साल की होने वाली थी’

एलएनजेपी अस्पताल के बाहर मनोज शाह गहरी उदासी में दीवार का सहारा लेकर खड़े थे। उनकी आँखों में आँसू थे। उनकी 11 वर्षीय बेटी सुरुचि, उनके माता-पिता विकास शाह और कृष्णा शाह, इस भगदड़ का शिकार हो चुके थे।

“मेरी बेटी अगले महीने 12 साल की होने वाली थी। हमने साथ में महा कुंभ जाने की योजना बनाई थी। मेरे माता-पिता मुजफ्फरपुर से दिल्ली आए थे। लेकिन कुछ घंटों में सब खत्म हो गया।

फोन पर अपने भाई से बेटी और माता-पिता की मौत की खबर सुनते ही मनोज स्तब्ध रह गए। उन्होंने रोते हुए कहा—
“खराब व्यवस्था ने मेरे पूरे परिवार को निगल लिया।”

‘आखिरी बार मैंने उसे खाने का डिब्बा दिया था’

कविता सहगल, जिन्होंने अपनी रिश्तेदार संगीता मलिक को खो दिया, ने भारी मन से बताया—
“संगीता अचानक ही महा कुंभ जाने के लिए तैयार हो गई थी। वह मेरे घर आई और बताया कि वह दोस्तों के साथ प्रयागराज जा रही है। मैंने उसके लिए खाने का डिब्बा पैक किया था। पर अब… वह लौटकर नहीं आएगी।”

‘शरीर ताश के पत्तों की तरह गिरे पड़े थे’

कपासहेड़ा निवासी पप्पू की सास पूनम भी इस भगदड़ में अपनी जान गँवा बैठीं। उन्होंने बताया—
“चारों तरफ लाशें बिछी हुई थीं। मैं अपनी सास को किसी तरह खींचकर अस्पताल ले गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। वे मेरी बेटी पम्मी से मिलने आई थीं। अब वे इस दुनिया में नहीं रहीं।”

‘टिकट था, लेकिन जिंदगी की गारंटी नहीं’

बिहार की रहने वाली शीला देवी अपने परिवार के साथ महा कुंभ जा रही थीं। भगदड़ में वे और उनके पति उमेश गिरी बुरी तरह घायल हुए। उनके रिश्तेदार संतोष ने बताया—
“शीला दीदी अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके पति की हड्डियाँ टूट गईं। उन्होंने तत्काल टिकट बुक कराया था, लेकिन रेलवे प्रशासन की लापरवाही ने उनकी जान ले ली।”

‘माँ का इंतजार था, लेकिन खबर मौत की आई’

द्वारका निवासी पूनम रोहिला की मौत की खबर सुनते ही उनके दोनों बच्चे एलएनजेपी अस्पताल के फर्श पर फूट-फूट कर रोने लगे। एक बेटा दर्द भरी आवाज़ में बोला—
“जैसे ही मुझे भगदड़ की खबर मिली, मैं स्टेशन भागा। फिर अस्पताल पहुँचा, और वहीं मुझे बताया गया कि माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं।”

‘वह परिवार का सहारा थी, लेकिन अब नहीं रही’

उन्नीस वर्षीय बेबी कुमारी, जो सात भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं, इस हादसे का शिकार हो गईं। आर्थिक तंगी के बावजूद, वे परिवार का सहारा थीं। उनके रिश्तेदार राजीव कुमार ने बताया—
“वह मेहनत-मजदूरी कर परिवार को पैसे भेजती थी। जल्द ही 12वीं कक्षा में दाखिला लेने वाली थी। लेकिन अब… उसकी उम्मीदें अधूरी रह गईं।”

‘कई लोग अभी भी लापता हैं’

इस हादसे ने कई परिवारों को अधूरा छोड़ दिया। राजकुमार मांझी, जिन्होंने अपनी पत्नी शांति देवी और बेटी पूजा कुमारी को खो दिया, अभी भी अपने लापता बेटे की तलाश कर रहे हैं।

‘अस्पताल में मातम का माहौल’

शनिवार देर रात, एलएनजेपी अस्पताल में एंबुलेंसों का तांता लगा था। हर ओर रोते-बिलखते परिजन थे। एक महिला, जिसने अपने रिश्तेदार को अस्पताल में भर्ती कराया, ने बताया—
“मैंने एक नंगे बच्चे को देखा, जिसे अस्पताल में ले जाया जा रहा था। वह बुरी तरह सांस लेने के लिए जूझ रहा था।”

निष्कर्ष

यह भगदड़ एक बार फिर यह साबित करती है कि भारत में भीड़ प्रबंधन प्रणाली कितनी कमजोर है। उत्साह से भरे श्रद्धालु मौत के मुँह में समा गए। प्रशासन की लापरवाही ने निर्दोष लोगों की जान ले ली।

अब वक्त है कि सरकार और रेलवे प्रशासन इस दर्दनाक घटना से सबक लें और ट्रेन यात्राओं के दौरान सख्त सुरक्षा प्रबंधन लागू करें ताकि भविष्य में ऐसा कोई हादसा न हो।

ABHISHEK KUMAR ABHAY
ABHISHEK KUMAR ABHAY
I’m Abhishek Kumar Abhay, a dedicated writer specializing in entertainment, national news, and global issues, with a keen focus on international relations and economic trends. Through my in-depth articles, I provide readers with sharp insights and current developments, delivering clarity and perspective on today’s most pressing topics.
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