छठ महापर्व

छठ पर्व का समापन 

छठ महापर्व की शुरुआत हो चुकी है और आज व्रती शाम को ढलते हुए सूरज को अर्घ्य देकर भगवान सूर्य के प्रति आभार व्यक्त करेंगे तो कल सुबह उगते हुए सूरज के दर्शन अपने व्रत को खोलेंगे आईए जानते हैं छठ के विषय में और भी बहुत कुछ 

छठ महापर्व

छठ महापर्व की शुरुआत हो चुकी है। महिलाएं, पुरुष छठ के व्रत की तैयारी दिवाली से पहले ही या दिवाली के साथ ही शुरू कर देते हैं। पहनने के लिए नया कपड़ा, बिछाने के लिए नया चादर, नया गेहूं, नया अनाज नया अंगोछा, सब कुछ नया, सब कुछ शुद्ध सब कुछ स्वच्छ। जिन व्यक्तियों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं होती कि वह सब कुछ नया ले सके तो सिर्फ छठ के लिए ही उसे वस्त्र को उस वस्तु को प्रयोग कर साल भर के लिए संभाल कर रख देते हैं और अगले साल इस वस्तु को दोबारा प्रयोग कर लेते हैं। छठ के बर्तन साल भर में सिर्फ छठ में ही प्रयोग किए जाते हैं। चाहे वह ठेकुआ बनाने का सांचा हो या फिर गन्ने की खीर बनाने का बर्तन हो या आटा गूंथने की परात हो अमीर हो या गरीब छठ के दिन हर पूर्वांचल वासी सब कुछ स्वच्छ और शुद्ध प्रयोग करता है।

नहाए खाए वाले दिन रखा जाता है शुद्धता स्वच्छता का ध्यान

 अपने ईष्ट को मनाने के लिए पूर्वांचल वाले सिर्फ बाहर की ही नहीं बल्कि मन की स्वच्छता और शुद्धता पर भी विश्वास करते हैं तभी तो व्रत शुरू होने के 2 दिन पहले से ही व्रत की तैयारी शुरू हो जाती है। नहाए खाए वाले दिन बिना लहसुन प्याज का खाना खाकर, नहा धोकर ,अपने बालों को धोकर, सुहागन स्त्रियों द्वारा महावर लगाकर खुद को स्वच्छ सुंदर और पवित्र बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। भोजन में भी कहीं कद्दू तो कहीं लौकी और दाल अरहर या चने की जो कि बनाने में आसान और व्रती को एक पूरे दिन के लिए भूखा रखने की ऊर्जा देने में सक्षम होती है। जिस दिन नहाए खाए होता है उसी दिन व्रती महिलाएं गेहूं को धोकर, सुखाकर साफ कर लेती है वहीं पर बैठकर गेहूं की रखवाली करती है ताकि गेहूं पर कोई चिड़िया बैठ ना पाए।

खरना,रसियाव वाले दिन व्रती निर्जल रहकर शाम को खाते हैं गुड़ की खीर  

खरना, रसियाव वाले दिन कुछ व्रती तो सूरज निकलने से पहले फल मखाने दूध खा भी लेते है तो कुछ केवल जल ग्रहण करते हैं, कुछ व्रती तो बिना कुछ खाए ही पूरे दिन का व्रत निकाल देते हैं जाने ई श्वर उन्हें कैसे इतनी शक्ति और ऊर्जा दे देते हैं कि वह जल की बूंद भी ग्रहण किए बिना काम में लगे रहते हैं। और शाम को भी सिर्फ गन्ने की खीर जो की पहले नए चावल को पानी में पकाकर फिर ऊपर से गुड़ डालकर धीमी आंच पर पकाई जाती है। जब गुड़ भी गल जाता है तब इसमें ऊपर से दूध डाला जाता है। इसे बनाना भी आसान नहीं है क्योंकि अगर आप आंच तेज करेंगे तो आपकी खीर पकने की बजाय जल जाएगी क्योंकि पानी तो उड़ जाएगा और आपके चावल के कच्चे रह जाएंगे।

कभी-कभी तो कोई व्रती इस भोजन को ग्रहण ही नहीं कर पाता क्योंकि पूरे दिन पानी की एक बूंद न लेकर जब आप सिर्फ मीठा खाते हैं तो फिर आपसे वह खाया ही नहीं जाता। और फिर शुरू होता है अगले पूरे एक दिन और रात का व्रत 

छठी का दिन जिस दिन भगवान सूर्य को शाम के समय आगे देकर सम्मान आभार करते हैं व्यक्त

इस दिन पूरे दिन आप निर्जला व्रती होते हैं। ठेकुआ प्रसाद बनाते हैं। शाम को भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हैं। जिन व्रती महिलाओं ने कोसी भारी होती है वह घाट से आकर अपनी कोसी से जाती है भजन करते हैं। अगले दिन सुबह ही भगवान सूर्य के दर्शन कर गुड़, चने और अदरक से अपने व्रत का समापन करते हैं।

 

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