Bombay High Court एक बार फिर अपने संवैधानिक अधिकारों और न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए सुर्खियों में है। इस बार मामला मुंबई महानगरपालिका (BMC) के आयुक्त द्वारा कोर्ट स्टाफ को चुनाव ड्यूटी में तैनात करने से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने न सिर्फ इस कदम को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया, बल्कि BMC प्रमुख को कड़ी फटकार भी लगाई।
यह मामला न केवल प्रशासनिक चूक का उदाहरण है, बल्कि यह भी दिखाता है कि Bombay High Court किस तरह संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करता है।
Bombay High Court बनाम BMC: पूरा मामला क्या है?
मुंबई में आगामी नगर निगम चुनावों को लेकर प्रशासनिक तैयारियाँ चल रही थीं। इसी क्रम में Brihanmumbai Municipal Corporation (BMC) के आयुक्त भूषण गगरानी ने 22 दिसंबर 2025 को एक पत्र जारी किया।
❓ उस पत्र में क्या कहा गया था?
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मुंबई के सभी अधीनस्थ न्यायालयों के कर्मचारियों को
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चुनाव ड्यूटी के लिए रिपोर्ट करने का निर्देश
यहीं से विवाद की शुरुआत हुई।
Bombay High Court ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) क्यों लिया?
Bombay High Court ने इस पूरे मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सवाल उठाया कि—
“क्या BMC आयुक्त को कोर्ट स्टाफ को बुलाने का अधिकार है?”
हाई कोर्ट ने साफ कहा कि:
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कोर्ट स्टाफ न्यायपालिका के नियंत्रण में आता है
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BMC या कोई भी चुनाव अधिकारी उन्हें सीधे निर्देश नहीं दे सकता
मुख्य न्यायाधीश की पीठ की सख्त टिप्पणी
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की पीठ ने की।
कोर्ट की तीखी टिप्पणियाँ:
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“आप (BMC आयुक्त) किस कानून के तहत यह शक्ति लेते हैं?”
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“आप उन्हें समन नहीं कर सकते”
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“आपके पास ऐसा करने का अधिकार ही नहीं है”
यह टिप्पणी सीधे तौर पर प्रशासनिक अतिक्रमण (Overstepping Jurisdiction) की ओर इशारा करती है।
BMC आयुक्त ने मानी गलती
Bombay High Court की सख्ती के बाद BMC आयुक्त भूषण गगरानी को अपनी गलती स्वीकार करनी पड़ी।
उनकी ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रवि कदम ने अदालत को बताया:
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कोर्ट स्टाफ को बुलाने वाले पत्र गलती से जारी हुए
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अब सभी पत्र वापस ले लिए गए हैं
“अब खुद को बचाइए” – हाई कोर्ट की चेतावनी
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने बेहद अहम टिप्पणी की:
“अब खुद को बचाइए। दूसरे स्रोतों से व्यवस्था कीजिए।”
इसका सीधा मतलब था कि:
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कोर्ट स्टाफ को चुनाव ड्यूटी में किसी भी हाल में नहीं लगाया जाएगा
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चुनावी व्यवस्था के लिए अन्य सरकारी विभागों से स्टाफ लिया जाए
Article 235: क्यों अहम है यह मामला?
Bombay High Court ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 235 का हवाला दिया।
अनुच्छेद 235 क्या कहता है?
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उच्च न्यायालय को
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अधीनस्थ न्यायालयों और उनके स्टाफ पर
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पूर्ण नियंत्रण और पर्यवेक्षण का अधिकार देता है
इसी आधार पर:
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2008 में प्रशासनिक समिति ने
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कोर्ट स्टाफ को चुनाव ड्यूटी से स्थायी रूप से मुक्त किया था
2008 का ऐतिहासिक फैसला
हाई कोर्ट ने याद दिलाया कि:
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सितंबर 2008 में
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Bombay High Court की Administrative Judges’ Committee ने
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स्पष्ट निर्णय लिया था कि:
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हाई कोर्ट
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और सभी अधीनस्थ न्यायालयों के कर्मचारी
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चुनाव ड्यूटी से मुक्त रहेंगे
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चेतावनी के बावजूद जारी हुआ दूसरा पत्र
हैरानी की बात यह रही कि:
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हाई कोर्ट की रोक के बाद भी
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एक Returning Officer ने
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शेरिफ कार्यालय को पत्र भेजकर
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दो कर्मचारियों की मांग की
हालांकि, बाद में:
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इसे भी तुरंत सुधार लिया गया
Bombay High Court का अंतिम रुख
हाई कोर्ट ने:
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चुनाव के बाद
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इस पूरे मामले की
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विस्तृत सुनवाई करने का निर्णय लिया है
यह संकेत है कि:
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भविष्य में ऐसी गलती दोहराई गई
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तो सख्त कार्रवाई संभव है
यह फैसला क्यों है बेहद महत्वपूर्ण?
🔹 न्यायपालिका की स्वतंत्रता
Bombay High Court का यह फैसला बताता है कि:
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न्यायिक प्रणाली किसी भी प्रशासनिक दबाव से ऊपर है
🔹 संविधान की रक्षा
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Article 235 की व्याख्या
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न्यायपालिका की स्वायत्तता को मजबूत करती है
🔹 चुनावी प्रक्रिया में संतुलन
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चुनाव जरूरी हैं
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लेकिन कानून से ऊपर नहीं
जनता और प्रशासन के लिए संदेश
इस पूरे प्रकरण से यह साफ होता है कि:
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सरकारी अधिकारी चाहे कितने बड़े क्यों न हों
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कानून के दायरे में रहकर ही कार्य कर सकते हैं
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Bombay High Court संविधान का प्रहरी है
निष्कर्ष
Bombay High Court का यह फैसला न सिर्फ एक प्रशासनिक गलती को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि भारतीय लोकतंत्र में संविधान सर्वोपरि है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता, अधिकारों की स्पष्ट सीमाएँ और कानून का सम्मान—यही इस पूरे प्रकरण का मूल संदेश है।