कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी चेतावनी दी है। अदालत ने संकेत दिया कि वह तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी के खिलाफ बिना अदालत की अनुमति के और प्राथमिकियां (FIR) दर्ज करने पर रोक लगाने वाला आदेश पारित कर सकती है।
अदालत ने क्या कहा
न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने राज्य सरकार द्वारा तृणमूल नेता के खिलाफ लगातार कई एफआईआर दर्ज कराए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई।
न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने स्पष्ट कहा कि अगर इसी तरह शिकायतें दर्ज होती रहीं, तो वह ब्लैंकेट इंजंक्शन यानी व्यापक निषेधाज्ञा का आदेश पारित करेंगे।
मामला क्या है
अदालत अभिषेक बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को चुनौती दी है।
ये मामले ‘सेबाश्रय’ शिविरों में कथित अनियमितताओं से जुड़े हैं, जिनमें चिकित्सकीय लापरवाही और समय-सीमा समाप्त दवाओं के इस्तेमाल के आरोप शामिल हैं। ये स्वास्थ्य शिविर जनवरी 2025 में उस समय शुरू किए गए थे जब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में थी।
अदालत की टिप्पणी सबूतों पर
सुनवाई के दौरान अदालत ने आरोपों की प्रकृति पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ये व्यापक और सामान्य किस्म के आरोप प्रतीत होते हैं, और उसे अभिषेक बनर्जी के साथ इनका सीधा संबंध नहीं दिखता। अदालत ने पूछा कि आखिर अभिषेक बनर्जी से इसका क्या संबंध है।
‘ब्लैंकेट इंजंक्शन’ का मतलब क्या
सामान्य स्थिति में किसी भी व्यक्ति के खिलाफ संज्ञेय अपराध की शिकायत पर पुलिस एफआईआर दर्ज कर सकती है। अदालतें आमतौर पर इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करतीं।
लेकिन जब अदालत को लगे कि किसी व्यक्ति के खिलाफ बार-बार समान प्रकृति की शिकायतें दर्ज कराई जा रही हैं, तो वह यह शर्त लगा सकती है कि आगे कोई भी एफआईआर उसकी अनुमति के बिना दर्ज न हो। यह एक असाधारण उपाय माना जाता है, जिसका उद्देश्य कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना होता है।
राजनीतिक संदर्भ
पश्चिम बंगाल में इस साल सत्ता परिवर्तन हुआ है, और अभिषेक बनर्जी अब विपक्ष की भूमिका में हैं। ऐसे में एक विपक्षी नेता के खिलाफ दर्ज हो रहे मामलों को लेकर अदालत की यह टिप्पणी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
यह मामला उस व्यापक बहस का हिस्सा भी है कि सत्ता परिवर्तन के बाद पुरानी सरकार के नेताओं के खिलाफ दर्ज होने वाले मामलों को कैसे देखा जाए — और इनमें कानूनी प्रक्रिया तथा राजनीतिक प्रतिशोध के बीच की रेखा कहां खींची जाए।
आगे क्या
अब देखना यह होगा कि अदालत वास्तव में व्यापक निषेधाज्ञा का आदेश पारित करती है या नहीं, और राज्य सरकार का रुख क्या रहता है। अदालत की चेतावनी के बाद नई शिकायतों की गति पर भी नजर रहेगी।

